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मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज

सुनिए मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज के स्वर में तथा रचित ‘बारह भावना’

 

 

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हाइकूजापानीछंदसतरहअक्षरोंमें ! – मुनिश्रीयोगसागरमहाराजजी
हाइकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने 200 से ज्यादा हाइको लिखे हैं।

1 – मृत्यु अमर, यहाँ कौन दिखेगा, अमर यहाँ।
2 – तू ना समझा, नश्वर के शरण, में अशरण।
3 – विकृत वस्तु, के परिणमन का, नाम संसार।
4 – तू है चिद्रूप, पर क्यों रूप बना, तेरा विद्रूप।
5 – रूप कुरूप, से परे अरूप है, तेरा स्वरुप।
6 – भग्न घट सी, काया निशदिन ही, मॉल झराये।
7 – योगों की क्रिया, जिसकी प्रतिक्रिया, कर्मास्रव है।
8 – बाहर नहीं, भीतर निहारना, निरास्रव है।
9 – अनगार की, ध्यान की चिनगारी, कर्म जलाये।
10 – कहीं निहाल, तो कहीं है बेहाल, जग का हाल।

11 – कारागार को, जिनालय बनाना, अतिदुर्लभ।
12 – वही है धर्म, विष को सुधामय, परिणमाये।
13 – पुष्प महके, अलिदल दौड़ते, ना ही बुलाते।
14 – काँटों के बीच, गुलाब का जीवन, कैसी ग़ुलामी।
15 – अमल करो समल विमल हो ज्यों कमल सा।
16 – क्षणभंगुर, अंगुर पे झूमते, ज्यों लंगुर से।
17 – भीतर नहीं, बाहर निहारना, पापास्रव है।
18 – प्रदर्शन तो, मृगमरीचिका है, केवल धोका।
19 – वैराग्य पुष्प, जीवन उद्यानों को, महकता है।
20 – जिन्हें जाप से, ताप सा प्रतीत हो, उन्हें क्या कहें।

21 – मंगलमय, देव गुरु शास्त्र को, मम प्रणाम।
22 – जिसके तुम, हवाला दे उनके, क्या हवाला हो।
23 – शांत चित्त ही, सा शास्त्रों का ज्ञाता, चेतन कृति।
24 – कांच सा प्याला, तेरी सुन्दर काया, कब क्या होगा।
25 – जिसे जिनसे, शल्य हो उनसे क्या, प्रयोजन है।
26 – ये सुख दुःख, तेरे परिणामों का, परिपाक है।
27 – पुरुषार्थ की, चमक झलकती है, भाग्योदय में।
28 – चिंता न करो, सफलता मिलती, चिंतन से ही।
29 – असुंदर में, सुन्दर का निवास, मोह की नशा।
30 – तेरा स्वरुप, सुख दुःख से परे, ज्ञाता दृष्टा है।

31 – पूजनीय वे, कर्ता भोक्ता औ स्वामी, पन से परे।
32 – वक्त पर जो, भक्त बनता वह, विभक्त होता।
33 – भेद विज्ञान, अंतर जगत का, दिवाकर है।
34 – पुण्योदय में, गाफिल, पापोदय, होश हवास।
35 – मल पिटारा, में बहुमूल्य हीरा, कब से गिरा।
36 – जात पात से, परे यथा जात जो, पारिजात सा।
37 – त्रैलोक्य में है, जीवों का प्रिय यार, शुद्ध बयार।
38 – कविता गायें, ह्रदय की गंथियाँ, हम गलाये।
39 – सुनो हायको, कर्मों की चमत्कार, तुम परखो।
40 – प्रभावित हो, उपादान निमित्त, प्रभाव डाले।

41 – एक दिन तो, मरना है कल्याण, मेरा कैसे हो।
42 – प्रत्येक श्वास, , यमपुर की ओर, बढे कदम।
43 – कर्तव्यता में, दक्षता ही शिष्य की, गुरु दक्षिणा।
44 – एक क्षण भी, संत संग अनंते, पाप नशाये।
45 – शीतलमयी, क्षमोत्तम नीर से, क्रोधाग्नि बुझे ,।
46 – मार्दव फल, विनय द्रुम पर, ‘ ही फलता है।
47 – औपचारिक, निर्गंध पुष्प, निज को छलता है।
48 – तन तिनका, समझेगा तभी तो, हीरा दिखेगा।
49 – असुंदर क्या, असुंदर से कभी, सुन्दर होगा।
50 – अहंकार के, अलंकार से प्राणी, अलंकृत है।

51 – समयसार, की आराधना निजकी, आराधना है।
52 – मर्म सहित, कर्म में धर्म है ये, शर्म दिलाये।
53 – मान को त्यागो, मानवर्धमान हो, सन्मान मिले।
54 – माया का जाल, आर्जव कृपान से, काटा जाता है।
55 – मुनि वैद्य है, जन्म जरा मृत्यु के, रोग निवारे।
56 – वायदा में ना, फायदा यही यहाँ, का है कायदा।
57 – लोभ अशुचि, पावन संतोष से, धुल जाता है।
58 – रत्नत्रय का, सुन्दर संदूक तो, दिगम्बरत्व।
59 – अज्ञान धरा, पे भय के अंकुर, उग आते हैं।
60 – परिग्रह का, प्रायश्चित दान तो, अभिमान क्यों।

61 – संतो का कोई, पन्थ नहीं आगम, ही पन्थ रहा।
62 – समता में जो, रमता भवदधि, वह तिरता।
63 – यम नियम, संयम तप ये आत्मा पर, करें रहम।
64 – अहंकार के चने, प्रशंसा नीर में फूल जाते।
65 – व्यवहार की कुशलता, ज्ञान की परिस्कृस्त्ता।
66 – झूट बोलना, स्व पर पे स्वयम, मूठ मारणा।
67 – नजरिया को, नज़र अन्दाज हो, नज़र आये।
68 – वीतरागी को, श्रृंगार अंगार सा, प्रतीत होता।
69 – अहंकार की, झंकार ममकार, की प्रतिध्वनि।
70 – मोहब्बत की, सौबत में नौबत, मुसीबत की।

71 – वचन पुष्प, गुरु के महकते, ना मुरझाते।
72 – धर्म वही है, जीवन में अहिंसा, दीप जलाये।
73 – प्रत्येक प्राणी, अपने आप से ही, परेशान है।
74 – बोलचाल से, व्यक्तिगत स्वाभाव, ज्ञात होता है।
75 – ना मै देह हूँ, मृत्यु मुझे क्या डर, दिखा सकती।
76 – अपने आप, को जानता उसे ना, भय सताता।
77 – कागज स्याही, के बीच जो रहस्य, ज्ञान वही है।
78 – दिगम्बर से, चिदम्बर अम्बर, पे ना निवास।
79 – ज्ञान कुठार, काया है मुठ कांटे, विधि द्रुम को।
80 – काया कावडी, कर्मों के भार लिये, आत्मा ढोती है।

81 – नर काया तो, जहाज भवादधि, तुम्हे तिराये।
82 – बुराई कोई, चीज नहीं भलाई, पे लगा जंग।
83 – जो प्रशंसा को, चाहे वो योग्यता से, कंगाल ही है।
84 – द्रव्य झल के, समता दर्पण में, पर्याय गौण।
85 – आप जो चाहो, दूसरों को भी चाहो, धर्म यही है।
86 – सच्चे स्नेही की, पहचान सेवा से, नाही बातों से।
87 – परमात्मा को, जिससे मिलन हो, वह योग है।
88 – दुःख संयोग, जिससे वियोग हो, वह योग है।
89 – तुम हिम हो, तपन अनुभव, क्यों करते हो।
90 – तुम सूर्य हो, मोमबत्ति में हर्ष, क्यों मानते हो।

91 – अर्जित धन, परिमार्जित होता, दान धर्म से।
92 – मै के मही में, अहंकार खटास, मानी का पेय।
93 – आत्मीय क्षीर, वात्सल्य मिठास से, छलकता है।
94 – चारित निष्ठ, ज्ञान अवा में पका, कुम्भ की भान्ति।
95 – असंयमी का, ज्ञान मद धुम्र सा, घना पावक।
96 – सत्य का रत्न, श्रमण जौहरी का, गले का हार।
97 – स्वर्गाय वर्ग, का अनन्य साधन, अहिंसा धर्म।
98 – सदभाव पुष्प, प्रभावना गंध से, महकता है।
99 – काल मृत्यु को, उपहार रूप में, सबको बांटे।
100 – यह काया तो, कागज नाव काल, जल में गले।

101 – तुम जौहरी, कांच के टुकड़े क्यों, बटोरते हो।
102 – तुम अमूर्त, तन की चिन्ता सदा, सताती क्यों है।
103 – मुक्ति की मुक्ता, , समता स्वाति नीर, से पैदा होती।
104 – अभव्यनोन, मिश्रित क्षीर घी की, कल्पना व्यर्थ।
105 – अनेकांत की, , सुधा स्यादवाद प्याले, से पान करे।
106 – तेरे मेरे के, ताना बाना से बना, संसार जाल।
107 – मानतुंग है, उतुंग पतंग से, मानजीत के।
108 – अपने आप, के अवलोकन से, भय का अन्त।
109 – पर्वतीय गुफा, में अनादी से जोत, जल रही है।
110 – ये नर तन, रतन न रतनो, का संदूक है।

111 – कर्त्तव्य निष्ठ, व्यक्ति को कोई कार्य, दुष्कर नहीं।
112 – ऐसी साधना, साधना सी सुरभि, सुरभित है।
113 – गुरु प्रसन्न, आज्ञा पालन से ना, ही प्रशंसा से।
114 – हिमखंड सी, समता विकल्पों की तरंगे नहीं।
115 – कल्याण वास्ते, आज्ञा का पालन ही गुरु सेवा है।
116 – संघर्षमयजीवन बने हर्ष, आदर्शमय।
117 – महाराज को, जाने वे महाराज, वन्द्य होते हैं।
118 – वक्त पर जो, रक्त बहाये देश, के वे शहीद।
119 – पुरुषार्थ ही, देव बनके फल, प्रस्तुत करे।
120 – नश्वर में है, अविनश्वर ये ही, परमेश्वर।

121 – दृश्य में छिपा, अदृश्य आदर्श सा, सदृश वाला।
122 – सरोवर में, जाकर भी पंक में, पग फसते।
123 – अहिंसा पुष्प, आसक्ति लता पर, नहीं खिलता।
124 – प्रतिशोध की, भावना का न होना, उत्तम क्षमा।
125 – रोष में नहीं, संतोष जहाँ क्षमा, वहां संतोष।
126 – सब लिखते, पर नहीं लखते, सो बिलखते।
127 – जो विभक्त को, अविभक्त करता, वही भक्ति है।
128 – व्यक्तिगत जो, भक्ति परमार्थ से, विभक्त करे।
129 – पत्थर मित्र, सात में असाता में, मित्र पत्थर।
130 – गमनाशक, रहम सो रहीम, बनना होगा।

131 – गुरु रहम, बाटते इसलिये, ये रहीम है।
132 – कैसा आश्चर्य, म्यान से तलवार, जंघ खा रहा।
133 – धनाभाव में, निर्धन इंधन सा, जलता ही है।
134 – धनी धन के, वियोग में उसका, निधन होता।
135 – आस्था का रास्ता, टूटा हो अपघात, अवश्य होता।
136 – भवितव्य का, बीज पुरुषार्थ की, माटी में फले।
137 – घृत को पाना, सहज पाचनता, सरल नहीं।
138 – ऐसा खुदा है, खुदा बनोगे तब, खुदा दिखेगा।
139 – नर पर्याय, ये अनोखा नौका है, मौका ना चूके।
140 – प्रत्येक वार, प्रत्येक वार करे, ध्यान है कहाँ।

141 – तलवार से, ना डरो तलवार, वाले से डरो।
142 – विश्वास लता, मृषा की तुषार से, जल जाती है।
143 – वडवानल, तृष्णा की तृषा सिंधु, बिंदु सी लगे।
144 – सर्व शास्त्रों का, ज्ञाता वही जिसका, चित्त शान्त है।
145 – श्रद्धा की आँखे, शिवपथ चलाती, शिव दर्षाती।
146 – तेरी नज़र, बदनज़र की भी, नज़र फिरे।
147 – मौत तूफां में, तन तिनका कब, ये उडजाये।
148 – राग और द्वेष, बहिर जगत का, प्रदूषण है।
149 – चित्त की शांति, संतोषाश्रित ना कि, द्रव्याश्रित है।
150 – दिगम्बरत्व, शब्दातीत प्रष्नों का, उत्तर देता।

151 – आलोचना को, वो करें अन्तस के, लोचन नहीं।
152 – जो हरि है ओ, जौहरी है तुम भी, जौहरी बनो।
153 – विख्यात नहीं, मुझे होना पाना है, यथाख्यात को।
154 – पुष्प जीवन, एक दिन सुरभि, अमर हुई।
155 – श्याम कहते, जिंदगी श्याम हुई, श्याम ना मिले।
156 – आतम में है, आतम इसलिये, बहिरातम।
157 – मोह रावण, रत्नात्रय रेखायें, लाँघता कैसे।
158 – कमल चले, पर जीवों का कहीं, कलम ना हो।
159 – सदभावना की, ज्योति प्रभावना की, आलोक पुंज।
160 – सदविचारों से, परिणत आचार, सद्प्रचार है।

161 – असि धारा पेच, लने वाले असि, को ना चलाये।
162 – तलवार से, नहीं हिंसावाणी के, दुरूपयोग।
163 – तेरा भूषण, आभूषण से नहीं, सदाचार से।
164 – जैसा दिखता, , वैसा न रहता सो, जगपसता।
165 – तेरी वस्तु है, तेरे पास पर तू, जगह चूका।
166 – सत्य अहिंसा, ये दो आलोक पुंज, धर्म के आँखें।
167 – राम बाण है, संयम पराजित, होता यम भी।
168 – गोदुग्ध सुधा, हिंसक उर में भी, अहिंसा जगे।
169 – नकली सोना, असली से अधिक, चमकता है।
170 – संत देखता, संयम मुकुर में, निज स्वरूप।

171 – माया के पीछे, मायाचार दुनिया, माया बाजार।
172 – ये काया तुंबी, है विषैला इसी से, भवाब्धितिरे।
173 – दृष्य को देख, दृष्टा को भूलना ही, अविवेक है।
174 – वनराज हो, मुषक से बिल में, क्यों तुम बसे।
175 – पारदर्शक, जीवन हो काँच सा, दर्पण नहीं।।
176 – देह दही को, दण्डित करे तो क्यों। दह दासता।
177 – भक्त की भक्ति, सर्वोपरि जो सदा, प्रसन्नता में।
178 – चर्म में नहीं, शर्म शर्म का धाम, चर्म में छिपा।
179 – प्रदर्शन तो, प्रदुर्षण विकृत, हुआ दर्शन।
180 – अमा की रात, मार्दव का मनीका, रात पूनम।

181 – आकर्षण के, अभाव में जीवन, उत्कर्ष होगा।
182 – हिंसा को करें, परिहार निज में, करें विहार।
183 – अहम का है, जहाँ वहम वहाँ, है ना रहम।
184 – पिंजड़े को ही, निज नीड़ समझे, पंच्छी ओ मूर्ख।
185 – लालसाओं में, ना लाल सा स्व लाल, निजाधीन है।
186 – जहाँ सन्देह, वहाँ दिल से दिल, फ़ासले दिखे।
187 – गुरुवाणी है, खुर्माणी क्यों नहीं, सुने नादानी।
188 – राहु ग्रसित, अनन्तानन्त सूर्य, दिखाई देते।
189 – रंग बिरंगी, तरंगें उठ रही, अन्तरंग में।
190 – समयसार, गाथा तेरी जीवन, गाथा को गाऐं।

191 – सुख-दु:ख के, आवेग को सम्हालें, वह योगी है।
192 – तेरी प्रवृत्ति, तुझे ही अध: उर्ध्व, मुखी बनाती।
193 – कवि है रवि, अन्तर जगत को, रोशन करें।
194 – मैं एक बीज, जिससे घोर घने, जंगल बने।
195 – बिन कारण, कषाय करें पूर्व, जन्म का बैरी।
196 – गीली लकड़ी, जले कम धूम ही, ज़्यादा निकालें।
197 – वीतरागी की, आराधना किसी की, ना विराधना।
198 – भूल स्वीकारो, भूल सुधारो कभी, भूल ना करो।
199 – कल्याण से ना, कल्याण है कल्याण, तजो कल्याण।
200 – वर्णातीत है, तेरी आत्मा दृष्टि क्यों, चर्म वर्ण पे।

201 – कुल्हाड़ी मिली, लेकिन बे डण्डी की, मूठ लगी है।
202 – गद्य-पद्य में, यमक नमक सा, सरस लाए।
203 – रवि शब्द को, विलोम कर पढ़ो, वीर का दर्श।
204 – शास्त्र सुनाते, हरि से हरि बने। तुम तो नर।
205 – मोह का ताज, सकने लग ये सो, मोहताज हैं।
206 – वैराग्य कली, ध्यान सूर्योदय में, खिले महके।
207 – पाप- पुण्य को, खेल को जीतो मिले, मुक्ति अवार्ड।
208 – वह क्यों तुम, कहते हो जो कभी, करते नहीं।
209 – कर्म को करो, ऐसा जिस कर्म से, कर्म भस्म हो।
210 – कठपुतली, नाच रही चालक, कहीं न दिखे।

211 – ज्ञानी हो के भी, है मूर्ख स्व को नहीं, पर को जाने।
212 – अहिंसा दीप, उर में जलाओ तो, रोज़ दिवाली।
213 – कली काल की, कलि खिली सूर भी, आर्त को लिये।
214 – अर्जित धन, परिमार्जित होता, दान धर्म से।
215 – ज्ञान सरोवर में, महक रहा।
216 – नाम ना चाहो, नाम का विलोम क्या, मना करता।
217 – मौन रहना, मौन का विलोम क्या, नमौ सिद्धाणं।
218 – सूर्योदय में, उड़ चला गगन, नीड का पंछी।
219 – तमन्ना लिये, दरकास्त खुदा को, ना बरदास्त।
220 – मधुर दुग्ध, लवन से बचाये, अन्यथा फटे।

2 Comments

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  • jai jinendra,

    muni shri yogsagar ji maharaj ji ki jay ho ,muni shri ka chintan aur manan kitna gambhir hai yah unke dwara likhi gayi kawita se jalakta hai …….aur ho bhi kyu na akhir we hai bhi to acharya shri vidhyasagar ji ke suyogya shishya

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