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आचार्य श्री विद्यासागर जी

श्रीमती सुशीला पाटनी
आर.के. हाऊस,
मदनगंज- किशनगढ़ (राज.)

मंदिर में जाकर यदि भगवान से पूछो कि तुम कौन हो तो प्रतिध्वनि आती है तुम कौन हो। यदि हम कहें कि आप भगवान हो तो प्रतिध्वनि सुनार्इ देगी कि आप भगवान हो। मंदिरों की इससे अधिक महिमा और क्या हो सकती है।

प्रभु के हृदय की बात जब तक नहीं समझोगे तब तक उन जैसी चैतन्य परिणति को प्राप्त नहीं कर सकते।

भारतीय मानस श्रद्धा-भक्ति से भरा है, यही कारण है कि यहाँ के निवासियों ने मकानों के साथ-साथ पूजा स्थल मंदिरों का भी निर्माण किया है। भारत में ऐसा कोर्इ भी गांव नहीं जो मंदिरों – मूर्तियों से विहीन हो।

भक्त को भगवान से कुछ याचना नहीं करनी चाहिये अरे ! जिस भक्ति के माध्यम से मुक्ति का साम्राज्य मिल सकता है उससे संसार की तुच्छ वस्तु मांगकर भक्ति को क्यों दूषित करते हो।

दिगम्बरत्व धूप के समान है। उसका उपयोग चाहे जितना कीजिये पर उसे बाँधने का प्रयत्न मत कीजिये। वह धूप है किसी के बाँधने से नहीं बँधेगी स्वतन्त्रता उसके स्वभाव में है।

जिसका मन रूका है और पैर चल रहे है वह साधु है, और जिसके पैर रूके हैं मन चल रहा है वह स्वादु है।

हम जैसे – जैसे क्रियाओं के माध्यम से राग – द्वेष को संकीर्ण करते जायेंगे। वैसे – वैसे आत्मा के निकट पहुँचते जायेंगे।

आज देश में  सबसे बड़ी समस्या भूख – प्यास की नहीं बलिक आन्तरिक विचारों के परिमार्जन की है। दूषित विचारों से ही विश्व में त्राहि – त्राहि मच रही है। यह समस्या धर्म और दया के अभाव से ही है। एक दूसरे की रक्षा के लिए कोर्इ तैयार नहीं है, जो कल तक रक्षक थे वे ही आज भक्षक हो गये हैं।

बड़े – बड़े काले पाषाण खण्डों के बीच से गुजरती हुर्इ पानी की धारा बहती है। मोह भी एक ऐसी ही धारा है जिसमें बडे़ – बड़े सन्त बह जाते हैं। जिसका जीवन साफ सुथरा है वही मोह की धारा को पार कर सकता है।

आचार्यों का उपदेश साधकों के लिए केवल इतना ही है कि हाथ से कल्याण का संकेत करें और मुख का प्रसाद बिखेर दें इससे ज्यादा उन्हें और कुछ नहीं करना है।

स्वाध्याय करते हुए भी जिसके कदम चारित्र की ओर नहीं बढ़ रहे हैं इसका अर्थ यही है उसने स्वाध्याय करना तो सीख लिया है किन्तु स्वाध्याय के वास्तविक प्रयोजन को प्राप्त नहीं किया।

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मेरी भावना है कि संत शिरोमणि विद्यासागरजी महामुनिराज का विहार ललितपुर से यहां होना चाहिए :




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