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आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज जी की जीवन-गाथा

Vidyasagar Maharajभारत-भू पर सुधारस की वर्षा करने वाले अनेक महापुरुष और संत कवि जन्म ले चुके हैं। उनकी साधना और कथनी-करनी की एकता ने सारे विश्व को ज्ञान रूपी आलोक से आलोकित किया है। इन स्थितप्रज्ञ पुरुषों ने अपनी जीवनानुभव की वाणी से त्रस्त और विघटित समाज को एक नवीन संबल प्रदान किया है। जिसने राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और संस्कृतिक क्षेत्रों में क्रांतिक परिवर्तन किये हैं। भगवान राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, ईसा, हजरत मुहम्मदौर आध्यत्मिक साधना के शिखर पुरुष आचार्य कुन्दकुन्द, पूज्यपाद्, मुनि योगिन्दु, शंकराचार्य, संत कबीर, दादू, नानक, बनारसीदास, द्यानतराय तथा महात्मा गाँधी जैसे महामना साधकों की अपनी आत्म-साधना के बल पर स्वतंत्रता और समता के जीवन-मूल्य प्रस्तुत करके सम्पूर्ण मानवता को एक सूत्र में बाँधा है। उनके त्याग और संयम में, सिद्धांतों और वाणियों से आज भी सुख शांति की सुगन्ध सुवासित हो रही है। जीवन में आस्था और विश्वास, चरित्र और निर्मल ज्ञान तथा अहिंसा एवं निर्बैर की भावना को बल देने वाले इन महापुरुषों, साधकों, संत कवियों के क्रम में संतकवि दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज वर्तमान में शिखर पुरुष हैं, जिनकी ओज और माधुर्यपूर्ण वाणी में ऋजुता, व्यक्तित्व में समता, जीने में संयम की त्रिवेणी है। जीवन-मूल्यों को प्रतिस्ठित करने वाले बाल ब्रह्मचारी श्री विद्यासागर जी स्वभाव से सरल और सब जीवों के प्रति मित्रवत व्यवहार के संपोषक हैं, इसी के कारण उनके व्यक्तित्व में विश्व-बन्धुत्व की, मानवता की सौंधी-सुगन्ध विद्यमान है।

आश्विन शरदपूर्णिमा संवत 2003 तदनुसार 10 अक्टूबर 1946 को कर्नाटक प्रांत के बेलग्राम जिले के सुप्रसिद्ध सदलगा ग्राम में श्रेष्ठी श्री मलप्पा पारसप्पा जी अष्टगे एवं श्रीमती श्रीमतीजी के घर जन्मे इस बालक का नाम विद्याधर रखा गया। धार्मिक विचारों से ओतप्रोत, संवेदनशील सद्गृहस्थ मल्लपा जी नित्य जिनेन्द्र दर्शन एवं पूजन के पश्चात ही भोजनादि आवश्यक करते थे। साधु-सत्संगति करने से परिवार में संयम, अनुशासन, रीति-नीति की चर्या का ही परिपालन होता था।

आप माता-पिता की द्वितीय संतान हो कर भी अद्वितीय संतान है। बडे भाई श्री महावीर प्रसाद स्वस्थ परम्परा का निर्वहन करते हुए सात्विक पूर्वक सद्गृहस्थ जीवन-यापन कर रहे हैं। माता-पिता, दो छोटे भाई अनंतनाथ तथा शांतिनाथ एवं बहिनें शांता व सुवर्णा भी आपसे प्रेरणा पाकर घर-गृहस्थी के जंजाल से मुक्त हो कर जीवन-कल्याण हेतु जैनेश्वरी दीक्षा ले कर आत्म-साधनारत हुए। धन्य है वह परिवार जिसमें सात सदस्य सांसारिक प्रपंचों को छोड कर मुक्ति-मार्ग पर चल रहे हैं। इतिहास में ऐसी अनोखी घटना का उदाहरण बिरले ही दिखता है।

विद्याधर का बाल्यकाल घर तथा गाँव वालों के मन को जीतने वाली आश्चर्यकारी घटनाओं से युक्त रहा है। खेलकूद के स्थान पर स्वयं या माता-पिता के साथ मन्दिर जाना, धर्म-प्रवचन सुनना, शुद्ध सात्विक आहार करना, मुनि आज्ञा से संस्कृत के कठिन सूत्र एवं पदों को कंठस्थ करना आदि अनेक घटनाऐं मानो भविष्य में आध्यात्म मार्ग पर चलने का संकेत दे रही थी। आप पढाई हो या गृहकार्य, सभी को अनुशासित और क्रमबद्ध तौर पर पूर्ण करते। बचपन से ही मुनि-चर्या को देखने , उसे स्वयं आचरित करने की भावना से ही बावडी में स्नान के साय पानी में तैरने के बहाने आसन और ध्यान लगाना, मन्दिर में विराजित मूर्ति के दर्शन के समय उसमे छिपी विराटता को जानने का प्रयास करना, बिच्छू के काटने पर भी असीम दर्द को हँसते हुए पी जाना, परंतु धार्मिक-चर्या में अंतर ना आने देना, उनके संकल्पवान पथ पर आगे बढने के संकेत थे।

गाँव की पाठशाला में मातृभाषा कन्नड में अध्ययन प्रारम्भ कर समीपस्थ ग्राम बेडकीहाल में हाई स्कूल की नवमी कक्षा तक अध्ययन पूर्ण किया। चाहे गणित के सूत्र हों या भूगोल के नक्शे, पल भर में कडी मेहनत और लगन से उसे पूर्ण करते थे। उन्होनें शिक्षा को संस्कार और चरित्र की आधारशिला माना और गुरुकुल व्यवस्थानुसार शिक्षा को ग्रहण किया, तभी तो आजतक गुरुशिष्य-परम्परा के विकास में वे सतत शिक्षा दे रहे हैं।

वास्तविक शिक्षा तो ब्रह्मचारी अवस्था में तथा पुनः मुनि विद्यासागर के रूप में गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी के सान्निध्य में पूरी हुई। तभी वे प्रकृत, अपभ्रंस, संस्कृत, कन्नड, मराठी, अंग्रेजी, हिन्दी तथा बंग्ला जैसी अनेक भाषाओं के ज्ञाता और व्याकरण, छन्दशास्त्र, न्याय, दर्शन, साहित्य और अध्यात्म के प्रकाण्ड विद्वान आचार्य बने। आचार्य विद्यासागर मात्र दिवस काल में ही चलने वाले नग्नपाद पदयात्री हैं। राग, द्वेष, मोह आदि से दूर इन्द्रियजित, नदी की तरह प्रवाहमान, पक्षियों की तरह स्वच्छन्द, निर्मल, स्वाधीन, चट्टान की तरह अविचल रहते हैं। कविता की तरह रम्य, उत्प्रेरक, उदात्त, ज्ञेय और सुकोमल व्यक्तित्व के धनी आचार्य विद्यासागर भौतिक कोलाहलों से दूर, जगत मोहिनी से असंपृक्त तपस्वी हैं।

आपके सुदर्शन व्यक्तित्व को संवेदनशीलता, कमलवत उज्जवल एवं विशाल नेत्र, सम्मुन्नत ललाट, सुदीर्घ कर्ण, अजान बाहु, सुडौल नासिका, तप्त स्वर्ण-सा गौरवर्ण, चम्पकीय आभा से युक्त कपोल, माधुर्य और दीप्ति सन्युक्त मुख, लम्बी सुन्दर अंगुलियाँ, पाटलवर्ण की हथेलियाँ, सुगठित चरण आदि और अधिक मंडित कर देते हैं। वे ज्ञानी, मनोज्ञ तथा वाग्मी साधु हैं। और हाँ प्रज्ञा, प्रतिभा और तपस्या की जीवंत-मूर्ति।

बाल्यकाल में खेलकूद में शतरंज खेलना, शिक्षाप्रद फिल्में देखना, मन्दिर के प्रति आस्था रखना, तकली कातना, गिल्ली-डंडा खेलना, महापुरुषों और शहीद पुरुषों के तैलचित्र बनाना आदि रुचियाँ आपमें विद्यमान थी। नौ वर्ष की उम्र में ही चारित्र चक्रवर्ती आचार्य प्रवर श्री शांतिसागर जी महाराज के शेडवाल ग्राम में दर्शन कर वैराग्य-भावना का उदय आपके हृदय में हो गया था। जो आगे चल कर ब्रह्मचर्यव्रत धारण कर प्रस्फुटित हुआ। 20 वर्ष की उम्र, जो की खाने-पीने, भोगोपभोग या संसारिक आनन्द प्राप्त करने की होती है, तब आप साधु-सत्संगति की भावना को हृदय में धारण कर आचार्य श्री देशभूषण महाराज के पास जयपुर(राज.) पहुँचे। वहाँ अब ब्रह्मचारी विद्याधर उपसर्ग और परीषहों को जीतकर ज्ञान, तपस्या और सेवा का पिण्ड/प्रतीक बन कर जन-जन के मन का प्रेरणा स्त्रोत बन गया था।

आप संसार की असारता, जीवन के रहस्य और साधना के महत्व को पह्चान गये थे। तभी तो हृष्ट-पुष्ट, गोरे चिट्टे, लजीले, युवा विद्याधर की निष्ठा, दृढता और अडिगता के सामने मोह, माया, श्रृंगार आदि घुटने टेक चुके थे। वैराग्य भावना ददृढवती हो चली। अथ पदयात्री और करपात्री बनने की भावना से आप गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पास मदनगंज-किशनगढ(अजमेर) राजस्थान पहुँचे। गुरुवर के निकट सम्पर्क में रहकर लगभग 1 वर्ष तक कठोर साधना से परिपक्व हो कर मुनिवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के द्वारा राजस्थान की ऐतिहासक नगरी अजमेर में आषाढ शुक्ल पंचमी, वि.सं. 2025, रविवार, 30 जून 1968 ईस्वी को लगभग 22 वर्ष की उम्र में सन्यम का परिपालन हेतु आपने मत्र पिच्छि-कमन्डलु धारण कर संसार की समस्त बाह्य वस्तुओं का परित्याग कर दिया। परिग्रह से अपरिग्रह, असार से सार की ओर बढने वाली यह यात्रा मानो आपने अंगारों पर चलकर/बढकर पूर्ण की। विषयोन्मुख वृत्ति, उद्दंडता एवं उच्छृंखलता उत्पन्न करने वाली इस युवावस्था में वैराग्य एवं तपस्या का ऐसा अनुपम उदाहरण मिलना कठिन ही है।

ब्रह्मचारी विद्याधर नामधारी, पूज्य मुनि श्री विद्यासागर महाराज। अब धरती ही बिछौना, आकाश ही उडौना और दिशाएँ ही वस्त्र बन गये थे। दीक्षा के उपरांत गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज की सेवा – सुश्रुषा करते हुए आपकी साधना उत्तरोत्त्र विकसित होती गयी। तब से आज तक अपने प्रति वज्र से कठोर, परंतु दूसरों के प्रति नवनीत से भी मृदु बनकर शीत-ताप एवं वर्षा के गहन झंझावातों में भी आप साधना हेतु अरुक-अथक रूप में प्रवर्तमान हैं। श्रम और अनुशासन, विनय और संयम, तप और त्याग की अग्नि मे तपी आपकी साधना गुरु-आज्ञा पालन, सबके प्रति समता की दृष्टि एवं समस्त जीव कल्याण की भावना सतत प्रवाहित होती रहती है।

गुरुवर आचार्य श्री ज्ञानसागर जी की वृद्धावस्था एवं साइटिकासे रुग्ण शरीर की सेवा में कडकडाती शीत हो या तमतमाती धूप, य हो झुलसाती गृष्म की तपन, मुनि विद्यासागर के हाथ गुरुसेवा मे अहर्निश तत्पर रहते। आपकी गुरु सेवा अद्वितीय रही, जो देश, समाज और मानव को दिशा बोध देने वाली थी। तही तो डॉ. पन्नालाल साहित्याचार्य ने लिखा था कि 10 लाख की सम्पत्ति पाने वाला पुत्र भी जितनी माँ-बाप की सेवा नहीं कर सकता, उतनी तत्परता एवं तन्मयता पूर्वक आपने अपने गुरुवर की सेवा की थी।

किंतु सल्लेखना के पहले गुरुवर्य ज्ञानसागर जी महाराज ने आचार्य-पद का त्याग आवश्यक जान कर आपने आचार्य पद मुनि विद्यासागर को देने की इच्छा जाहिर की, परंतु आप इस गुरुतर भार को धारण करने किसी भी हालत में तैयार नहीं हुए, तब आचार्य ज्ञानसागर जी ने सम्बोधित कर कहा के साधक को अंत समय में सभी पद का परित्याग आवश्यक माना गया है। इस समय शरीर की ऐसी अवस्था नहीं है कि मैं अन्यत्र जा कर सल्लेखना धारण कर सकूँ। तुम्हें आज गुरु दक्षिणा अर्पण करनी होगी और उसी के प्रतिफल स्वरूप यह पद ग्रहण करना होगा। गुरु-दक्षिणा की बात सुन कर मुनि विद्यासागर निरुत्तर हो गये। तब धन्य हुई नसीराबाद (अजमेर) राजस्थान की वह घडी जब मगसिर कृष्ण द्वितीया, संवत 2029, बुधवार, 22 नवम्बर,1972 ईस्वी को आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने अपने कर कमलों आचार्य पद पर मुनि श्री विद्यासागर महाराज को संस्कारित कर विराजमान किया। इतना ही नहीं मान मर्दन के उन क्षणों को देख कर सहस्त्रों नेत्रों से आँसूओं की धार बह चली जब आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने मुनि श्री विद्यासागर महाराज को आचार्य पद पर विराजमान किया एवं स्वयं आचार्य पद से नीचे उतर कर सामान्य मुनि के समान नीचे बैठ कर नूतन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के चरणों में नमन कर बोले – “ हे आचार्य वर! नमोस्तु, यह शरीर रत्नत्रय साधना में शिथिल होता जा रहा है, इन्द्रियाँ अपना सम्यक काम नहीं कर पा रही हैं। अतः आपके श्री चरणों में विधिवत सल्लेखना पूर्वक समाधिमरण धारण करना चाहता हूँ, कृपया मुझे अनुगृहित करें।“ आचार्य श्री विद्यासागर ने अपने गुरु की अपूर्व सेवा की। पूर्ण निमर्मत्व भावपूर्वक आचार्य ज्ञानसागर जी मरुभूमि में वि. सं. 2030 वर्ष की ज्येष्ठ मास की अमावस्या को प्रचंड ग्रीष्म की तपन के बीच 4 दिनों के निर्जल उपवास पूर्वक नसीराबाद (राज.) में ही शुक्रवार, 1 जून 1973 ईस्वी को 10 बजकर 10 मिनट पर इस नश्वर देह को त्याग कर समाधिमरण को प्राप्त हुए।

आचार्य विद्यासागरजी द्वारा रचित रचना-संसार में सर्वाधिक चर्चित ओर महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में
“मूक माटी” महाकाव्य ने हिन्दी-साहित्य और हिन्दी सत-सहित्य जगत में आचार्य श्री को काव्य की आत्मा तक पहुँचाया है।

संकलन-
सुशीला पाटनी
आर. के. हाऊस
मदनगंज- किशनगढ

46 Comments

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  • हज़ार गलतियों के बावजूद भी आप अपने आप से प्यार करते हो तो फिर क्यों आप किसी की एक गलती पे उससे इतनी नफरत करते हो ?

    आये नहीं कांधो पे न कांधो पे जाएंगे
    अपना जनाजा हम यहाँ खुद ही उठाएंगे

    सब कुछ लुटा दिया है हमने रब की चाहा में
    हम है फ़कीर अर्थी हम कहाँ से लायेंगे?

    दुनिया से मेरा अब न रहा कोई वास्ता
    कांधा लगाने लोग कहाँ से बुलाएँगे?

    तिर्थंकरो का तन विलीन हो कपूर सा
    तिर्थेश की परंपरा हम भी निभाएंगे

    सब चाहते है जिंदगी में रॉब-दाब हो
    जीते जो अर्थ में यहाँ अर्थी पे जाएंगे

    कांधो पे हमने कर लिया अब तक बहुत सफ़र
    कांधो की ये परंपरा कब तक निभाएंगे ?

    ‘जाहिद’ ही चल सका यहाँ ऐसे उसूल पे
    हम भी उसी की राह पे चल कर दिखायेंगे

  • jab kabhi tirthankar tatwa ka dhyan karte hai to jo swaroop khyalo mai aata hai wah bilkul hamare guruwar shri vidhyasagarji ki tarah hota hai.aise guru jo apne aap mai swayam arihant swarupi hai ke charno mai awikchinna namostu…………….tathakathit roop se sabhya aur shikshit wartman peedhi ko apka yah prayas kam se kam ek bar to awashya hi hamare gurudev ke kareeb layega aisa mera wishwas hai apko sadhuwad…..

  • is chand ko pad ke dil aur khush ho jaata hain….. aur aisa lagta hain ki bhagwan se paisa, ya jo wo chij jo lobh se judi hui usse mangne ki bajai bhagwan se yeh mangu ki hamesha apne guruwar acharya shri 108 paramoparam pujya, nirmal, nishpap, pak, pavitra,swacha vidyasagar ji maharaj ki chatrochaya main apni zindagi vyatit kar du…
    sabhi panch parmeshthi jo pichle yugo mein thi, jo is yug main hain , aur jo aagami yug main hongi unko main bahut hi sadar aur aadar bhav se naman karta hun…

  • Adbhut…adbhut…adbhut…Acharya shree ki yeh gaatha padte hue mere aansoon nikal aye, kya adbhut drashya hoga woh or dhanya honge veh log jinhe aisa chmatkarik drashya dekhne ko mila…shat shat naman Shree Vidyasagarji Maharaj or unke Guruvar Shree Gyansagarji Maharaj…

  • Guruvar k charno me so so bar namostu. aapka jeevan shuru se hi bhakti bhav me raha aur isi karan aap ne jab acharya Shri Shanti Sagarji Maharaj k darshan kiye to vairagya paida ho gaya avm Acharya DeshBhushan ji Maharaj se Brahmcharya Brat le kar, Acharya Gyan Sagarji Maharaj k pas shiksha hetu gaye. Yaha rochak bat ye hai ki jab gyan sagar ji maharaj ne kaha ki shiksha pakar ud jaoge to us samay k Balak Vidha dhar ne kaha to agar aisi bat hai to aaj se mai aajeevan transport ( Vahan) k tyag karta hun. Bahut Badi bat thi. Acharya Vidhya Sagarji Maharaj ne apne Gugu ki so seva ki vaisi seva aaj kal agar kisi to lakho ka dhan bhi mil jaye to apne parents ki seva nahi karega. satyendra jain

  • Aaj k yug me agar hame chaturth kal ka jita jagta udaharan dekhna ho to abhi aap guguvar Acharya Shri Vidhya Sagar ji ke Darshan k liye jaye. unki charya dekhe aur mahsus kare ki kya aaj aisa bhi sadhu ho sakta hai. Sabse Badi Bat hai ki aap ki sangh me jitne bhi maharaj avm mataji hai wo sab gratuate, post graduate avm aajivan brahamcharya brat liye hue hai.

    Sabse badi bat jo hai vo ye hai ki jis gugu ne aapki a b c d sikhaye usi guru ne aap ko Acharya Pad se vibhusit kiya avm suayam mni bankar sanlekhna purvak samadhi maran ki yachana ki. Jain Itihar me isa udaharan aur kahi bhi nahi nazar aata.

  • Jaikara Gurudev Ka..Vandan hai barambaar aise nisprihi sant Acharya Shri Vidhyasagar Ji ko..vandan hai shat shat…vartmaan ke vardhmaan..chhote baba ke jeevan ko itne achchhe se padhna, janna bahut achchha laga..aapko saadar jai jinendra evam dhanyavaad

  • _/♥_
    ॐ परम ब्रह्म परमात्मने नमः ॐ परम गुरुभ्यो नमः
    गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः ।
    गुरु साक्षात्‌ परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नमः ॥”
    एक नाम साचा एक नाम प्यारा….गुरुदेव मेरे गुरुदेव !
    ‘गुरु पूर्णिमा’ के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाये……._/♥_

  • UNKA JIWAN DHANYA HO GAYA AOUR VO SOBHAGYASHALI HAI JINKO AACHARYASHREE KE DARSHAN HOTE HAI AWAM JINHE UNKE SANIDHYA KA AWASAR MILTA HAI… AACHARYASHREE KO SHAT SHAT NAMAN

  • guruvar ke charno me sat sat naman!!!!
    guruvar ki jeevan gatha padne ke bad muje yeh mehsus hua ki agar ek jain hote hue bhi kisi ne guruvar ke ek bar bhi darshan na kie ho to veh jain shayad sahi maeno me jain na kehlae……..mai bahut bhagyashali hu ki muje unke darshan krne ka mauka mila …..halaki mai sirf unke pas ek hi bar gayi hu lekin fr bhi unse milne par or unke darshan krne par jeevan me jo parivartan mehsus maene kia hai veh shayad meri zindagi ka bahut hi acha or sukhad parivartan hai……mai chahti hu ki mai bar bar unke darshan kar pau …kyuki yeh mere jeevan ko manya banata hai .
    guruvar ke charno me sat sat naman

  • आचार्य श्री के चरणों में शत्-शत् नमन…….!!
    yeh toh mera sobhagy hai ki main ek jain hu… jahan aise sidh purush aaj bhi hai… jo sabhi ke jeevan ka kalyaan karke unhe sahi marg dikhlate hai… aise sadpurush ke
    चरणों में शत्-शत् नमन…….!!

  • muni shri k charno m shadaar namostu……aj k is yug m muni shri k pravach hmre anndkar bre jiwan m ek roshni h…jo hme sachhe marg pr chalne ka marg btate h………gurudev k darshan krne k bd esa lgta h jse ab gurudev ka sth mil jye or hm unke darsan ese hi krte rhe….mne gurudev k darshan jb bi kiye h hr br mje ek naya ehsaas hua unke smne jte hi htne ko maan hi krta…aj bi jb koi situation m confuce hoti hu to m gurudev ka naam lekr us kaam k uper apna faisla le leti hu……..jai jai gurudev hme yugo yugo tk ese hi marg dikhate rhe……..

  • Guruwar ke charno me shatshat pranam. yeh hamara bhagya hain ki hum bhagwan mahvir ji ki wani to na sun sake lekin Acharya Vidyasgaji ko to sun sakte hain,dekh, aur unka darshan bhi le sakte hain aise guruwar ko rhaday se pranam aur jinone yeh sankalan kiya, warnan kiya mano yeh sab aankhon ke samne sab ho raha hai unko man se dhanyawad.

  • Gurudev ke charano me shat shat naman !!!!!
    Jainam Jayatu Shashanam , Vande Vidyasagaram .
    He Bhagwant mujhe ajivan apka sanidhya prapt ho ……. aphi ke is Ahinsa path par age chal pau aisa ashirwad dijiye.

  • jb say maine bhagwan parasnath prabhu ke bare may jana aur unko apnaya hai ab say ek alg si shanti mili hai mn ko ………….mujhe aaj tk kisi jain muni k darshan krna ka saubhagya nhi mila mile dil say iccha hai ki mujhe ek baar darshan mil jaaye ……….mai unke updesho ko apnana chatha hun ….jai jinendra….Gurudev ke charano me shat shat naman !!!!!
    Jainam Jayatu Shashanam , Vande Vidyasagaram .
    He Bhagwant mujhe ajivan apka sanidhya prapt ho ……. aphi ke is Ahinsa path par age chal pau aisa ashirwad dijiye.

  • param pujya 108 acharya shree vidyasagar ji ke charan kamalon mein triyog samhaal kar…namostu namostu namostu

    kitni hi awaazon ne bulandi ko angeekaar kiya..
    hey bhagwan aapne maun reh kar bhi,hum sab patiton ka uddhar kiya…
    ek baar sun le jo sanyamit mit vaani aapki..
    is jeevan mein “ahinsa param dharm”, us har manas ne sweekaar kiya

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